सोमवार, 6 मार्च 2017

फेसबुक पर हजारवीं दोस्‍त

बाड़मेर यात्रा 15 फरवरी,2017  को एक गड़बड़ी के साथ शुरू हुई थी। बेंगलुरु से दिल्‍ली की उड़ान सुबह सवा नौ बजे थी। लेकिन एयरपोर्ट वाले इलाके में सुबह भारी कोहरा भी था। इस वजह से सुबह की सब उड़ान लेट चल रही थीं। एयरपोर्ट पर हमें बताया गया कि की हमारी उड़ान देर से जाएगी और इस वजह से दिल्‍ली से जोधपुर की उड़ान मिलना संभव नहीं है। हमने बाड़मेर के साथियों से फोन पर चर्चा की और तय किया कि दिल्‍ली तक की यात्रा तो कर ही ली जाए। दिल्‍ली से जोधपुर की हवाई यात्रा के बदले, वहाँ से रेल द्वारा सीधे बाड़मेर ही पहुँचा जाए। आनन-फानन में बाड़मेर के एक साथी ने दिल्‍ली से बाड़मेर के लिए तत्‍काल रेल टिकट बुक कराकर भेज दी।

लेकिन गड़बड़ केवल इतनी नहीं थी। उस दिन बेंगलुरु में एयरपोर्ट के पास एयर शो भी था। नतीजा यह कि सुबह 10 बजे से लेकर दोपहर 12 बजे तक न तो कोई हवाई जहाज उड़ सकता था और न ही उतर सकता था। इस कारण से हमारी दिल्‍ली की उड़ान भी रनवे पर दो घंटे खड़ी रही।

बहरहाल दोपहर तक दिल्‍ली पहुँच गए। ट्रेन पुरानी दिल्‍ली स्‍टेशन से थी। वहाँ तक जल्‍दी पहुँचने का सबसे सरल रास्‍ता मैट्रो रेल का था। उसके बारे में अधिक जानकारी के लिए Nishu Khandelwal को फोन लगाया। पर निराशा हाथ लगी। 

शाम जब बाड़मेर जाने वाली मालानी एक्‍सप्रेस संभवत: गुड़गाँव से गुजर रही थी, और हम उसमें बैठे थे, तो निशु का फोन आया। वह यह सुनकर बहुत दुखी हुई कि उसने हमसे मुलाकात का मौका गँवा दिया। उसने कहा वापसी में जरूर मिलना। पर हमें लौटना तो मुम्‍बई होकर था। यह सुनकर वह थोड़ी और उदास हो गई।
अपने सूरज के उगने संबंधी हमारे ऊटपटांग और भ्रमित करने वाले फेसबुक स्‍टेटस पढ़कर, बाड़मेर के साथियों ने इसी ट्रेन से जयपुर से आ रहे एक अन्‍य साथी Mahmood Khan की डयूटी इस बात का ध्‍यान रखने के लिए लगाई थी कि हम कहीं ट्रेन के गलत डिब्‍बे में न बैठ जाऍं। क्‍योंकि यह ट्रेन जोधपुर से दो हिस्‍सों में बँट जाती है। जयपुर में रात बारह बजे हमें महमूद खान ने ट्रेन के सही हिस्‍से में बर्थ पर गहरी नींद में सोता हुआ पाया, तो वे भी बाजू के कम्‍पार्टमेंट में जाकर खर्राटे भरने लगे। सुबह होने पर उन्‍होंने हमें खोजा और यह सब बताया।
तो बाड़मेर भी आखिर पहुँच ही गए। तीन दिन बाद 19 फरवरी को वापसी की यात्रा शुरू हुई, लेकिन फिर एक गड़बड़ के साथ। बाड़मेर से जोधपुर तक की यात्रा रेल से थ्‍ाी। आगे की यात्रा हवाई जहाज से थी। जोधपुर से व्‍हाया मुम्‍बई होकर। लेकिन जोधपुर एयरपोर्ट पर हमें बताया गया कि हमारी तो टिकट है ही नहीं। जो टिकट लेकर हम घूम रहे हैं, वह रद्द कर दी गई है। हुआ यह था कि ट्रेवल एजेंट की कुछ गलतफहमी के कारण दिल्‍ली-जोधपुर टिकट के साथ जोधपुर-मुम्‍बई टिकट भी कैंसिल कर दी गई। 

बहरहाल यहाँ-वहाँ फोन करके अंत में यह तय हुआ कि रात को उसी मालानी एक्‍सप्रेस को पकड़कर दिल्‍ली जाया जाए, जो हमें लेकर आई थी। वहाँ से अगले दिन यानी सोमवार की रात को बेंगलुरु की फ्लाइट मिलेगी। यानी अब हमारे पास आधा दिन था जोधपुर का किला देखने के लिए और सेामवार का लगभग आधा दिन दिल्‍ली में गुजारने के लिए।

निशु को फोन लगाया और अपनी दुख भरी गाथा सुनाते हुए उसे यह खुश खबरी दी कि कल हम दिल्‍ली आ रहे हैं, मुलाकात करना हो तो बताओ। खबर सुनते ही वह उछल पड़ी होगी, ऐसा फोन पर उसकी आवाज से लगा। थोड़ी देर की झिक-झिक के बात तय हुआ कि हमारी रेल गुड़गाँव से ही गुजरेगी, तो हम वहीं उतर जाएँ। निशु एक स्‍कूल में पढ़ाती है और गुड़गाँव में ही रहती है। निशु ने बताया कि वह तो सुबह स्‍कूल चली जाएगी और चार बजे लौटेगी। पर ऐसा कुछ इंतजाम कर जाएगी कि घर की चाबी हमारे हाथ लग जाए। 

हुआ भी ऐसा ही। लगभग ग्‍यारह बजे के आसपास हम गुड़गाँव पहुँचे। निशु ने एक शेयर टैक्‍सी बुक करवा दी थी। लगभग पैंतालीस मिनट गुड़गाँव की सैर के बाद निशु के घर पहुँचे। चाबी हमें बताए गए स्‍थान पर प्राप्‍त हो गई। हम ताला खोलकर वन बीओटीके (बेडरूम-ओपन टैरस-किचन) का मुआयना कर चुके थे। पर निशु जी हमें फोन पर समझा रहीं थीं, कि कहाँ क्‍या है। हमारे लिए खाने का आर्डर भी दिया जा चुका था। हमने स्‍नान-ध्‍यान किया और फिर भोजन। उसके बाद पास के बाजार का एक चक्‍कर लगाया। लगभग तीन बजे एक झपकी लेने का उपक्रम भी किया। 

ठीक चार बजे निशु दरवाजे पर खड़ी थी। हमसे मिलने की खुशी चेहरे से टपकी पड़ रही थी। अभी उसको आए दस मिनट भी न बीतें होंगे कि निशु के फोन में उनकी किसी सहेली की आवाज आ रही थी। मैंने बस इतना सुना कि, हाँ तू भी आ जा। 

और अगले दस मिनट बीतते-बीतते एक और महाशया दरवाजे पर खड़ी थीं। निशु ने परिचय कराया कि ये प्रीति हैं। यह एक दूसरे स्‍कूल में पढ़ाती हैं। आपके बारे में मुझसे सुनती रहती हैं, सो बस मिलने चली आई हैं। हमने उनका स्‍वागत किया।

मुझे छह बजे के लगभग एयरपोर्ट के लिए निकलना था। निशु ने पूछा कि रात के खाने के लिए क्‍या बनाया जाए। पहले तो मैंने मना किया, फिर मुझे लगा कि यह तो उसका रोज का ही काम होगा। मैं न भी खाऊँ, तो वह तो अपने लिए बनाएगी ही। तो फ्रिज में उपलब्‍ध सब्जियों पर नजर डालने के बाद अंतत: आलू-प्‍याज की सब्‍जी बनना तय पाया गया। निशु उठकर किचन के काम में लग गई।

इधर शुरू हुआ हमारा साक्षात्‍कार। निशु से पहली मुलाकात कब हुई, कैसे हुई, क्‍यों हुई आदि आदि। बीच-बीच में निशु भी आकर बातचीत में शामिल होती रही। फिर प्रीति ने अपने बारे में बताया। पंजाब में पैदा हुई और प्राथमिक शिक्षा भी वहीं हुई। बचपन से हिन्‍दी से बहुत लगाव रहा। पर दसवीं के पहले तक सबसे कम नंबर हिन्‍दी विषय में ही आते थे। पर उसके बाद हिन्‍दी की एक ऐसी अध्‍यापिका मिलीं कि काया पलट ही हो गई। हिन्‍दी माध्‍यम से बीएलएड किया और अब स्‍कूल में हिन्‍दी ही पढ़ाती हैं। होशंगाबाद में एकलव्‍य होकर आई हैं। थियेटर करती हैं। फेसबुक पर हमारी दोस्‍त नहीं हैं पर हम जो लिखते हैं वह सब पढ़ती हैं। अच्‍छा लगता है। पिता आयुर्वेदिक चिकित्‍सक हैं। माँ आँगनवाड़ी कार्यकर्ता रही हैं। प्रीति की नानी दिल्‍ली में अकेली रहती थीं। गिरने से उन्‍हें चोट लगी थी, मदद की जरूरत थी। प्रीति की माँ ने तय किया कि वे उनके साथ दिल्‍ली में रहेंगी। प्रीति पिता के साथ पंजाब में थी और छोटा भाई माँ के साथ दिल्‍ली में। बीच में एक दौर ऐसा आया कि प्रीति की माँ अपनी माँ को लेकर पंजाब चली गईं। पर मामला जमा नहीं। नतीजा यह कि वे एक बार फिर अपनी माँ और दोनों बच्‍चों को लेकर दिल्‍ली आ गईं। प्रीति की नानी अब नहीं हैं। पर परिवार तब से यहीं है। जितनी दिलचस्‍प प्रीति हैं, उतना ही दिलचस्‍प उनका छोटा भाई है। बकौल प्रीति वह पढ़ तो रहा है बीए में, पर उसका एक ही सपना है कि वह ड्रायवर बनना चाहता है। प्रीति भी अभी और पढ़ाई करना चाहती हैं। फिलहाल इग्‍नु से एक ओपन कोर्स कर रही हैं।

निशु एकलव्‍य, चकमक आदि के माध्‍यम से पहले से अपन को जानती थीं। पर दोस्‍ती फेसबुक पर ही परवान चढ़ी। जब हम उससे मिले तो उसे जीवन से भरा हुआ पाया। खुले दिमाग से सोचने-समझने, विचार-बहस करने वाली एक बिंदास युवा के रूप में। प्रीति से यह पहली मुलाकात ही थी, पर उसमें भी जीवन को देखने-समझने का एक जिज्ञासु व्‍यक्तित्‍व नजर आया। अब उससे भी मुलाकातें होती रहेंगी, क्‍योंकि वह दोस्‍त जो बन गई है। 

Preety Devgan फेसबुक पर हजारवीं दोस्‍त के रूप में भी तुम्‍हारा स्‍वागत है।
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(चलते चलते : निशु का मन था कि वह एयरपोर्ट तक छोड़ने आए, पर हमने ही मना कर दिया, क्‍योंकि बहुत अधिक समय था नहीं। एयरपोर्ट पहुँचते ही हमें बोर्डिंग पास आदि की औपचारिकताओं के लिए तुरंत ही अंदर जाना था। बहरहाल निशु ने रात के खाने लिए छह पराठे और स्‍वादिष्‍ट सब्‍जी देकर विदा किया। हमने उन्‍हें एयरपोर्ट पर स्‍वाद लेकर खाया भी।)

रविवार, 3 मई 2015

आटो से आटो तक



29 अप्रैल,15 की शाम को उदयपुर के सेवामंदिर चौराहे पर अपना यात्रा बैग लिए खड़ा था। मुझे बताया गया था कि वहां से स्‍टेशन जाने वाले आटो आसानी से मिल जाएंगे। दो-तीन खाली आटो तो बिना ध्‍यान दिए ही निकल गए। एक जो वहां था, उसने इतनी अधिक विनम्रता से स्‍टेशन जाने के लिए मना किया कि उसे गाली देने का मन भी नहीं हुआ।
बहरहाल मेरी ट्रेन साढ़े आठ बजे थी। अभी केवल सात बजा था। मैं बिलकुल टेंशन में नहीं था, टेशन ही जाना था। और छूट भी जाएगी तो ट्रेन ही होगी, प्‍लेन नहीं। ट्रेन का छूटना तो फिर भी मैनेज हो जाता है, पर प्‍लेन का छूटना मैनेज करना बहुत मुश्किल काम है। अपन दोनों एक-एक बार मिस कर चुके हैं, सो अच्‍छी तरह जानते हैं।
दस-बारह मिनट के इंतजार के बाद एक आटो वाले ने आखिरकार हम पर नजर इनायत की। वह अपनी ड्रायवरी की सीट पर एक और को भी साथ बिठाए हुए था। पर हमें उससे क्‍या। पूछा, स्‍टेशन चलोगे।
बोला, बैठो।
कितने होंगे। हमने पूछा।
अस्‍सी।
हमने कहा, ठीक। और लद गए।
हम भोपाल जैसे मेट्रो होते शहर के रहवासी रहे हैं और बंगलौर में जिस इलाके में रहते हैं, वह भी भोपाल से बहुत अलग तो नहीं है। सो आटो में बैठने से पहले किराया तय करने की आदत है। मीटर-वीटर से चलने वाले अपने को कम ही मिले हैं। पहले ही तय कर लो, ताकि बाद में कोई झंझट न हो। वरना पूरे रास्‍ते फिर दिमाग इसी में उलझा रहता है कि कितने पैसे मांगेगा या कि कितने बनेंगे। दो-तीन बार ऐसी झंझट से पाला पड़ चुका है।
अभी आटो लगभग एक किलोमीटर ही गया होगा कि आटो वाले ने पूछा, राणा प्रताप नगर स्‍टेशन जाना है या उदयपुर सिटी।  
मैंने कहा, मुझे उदयपुर-इंदौर एक्‍सप्रेस पकड़नी है।  
बोला, मतलब कि उदयपुर सिटी, तो सौ होंगे।  
मैंने कहा, ठीक है।
यात्रा कहने को तो यात्रा होती है, पर कितना कुछ दिखाती है, सिखाती है। 
स्‍टेशन समय पर ही पहुंच गया। सवा आठ के लगभग। एस टू में अपनी 46 नंबर की अपर बर्थ पर कब्‍जा किया। लोअर बर्थ पर एक युवा महिला अपनी लगभग डेढ़- दो साल की बच्‍ची के साथ थी। उसका पति प्‍लेटफार्म पर टहल रहा था। महिला,बच्‍ची को छेड़ने की दृष्टि से बार-बार कह रही थी कि, पापा तो अब नहीं आएंगे। और बच्‍ची रह रहकर रोने का जैसे अभिनय करने लगती थी। जब रेल के चलने का समय हुआ तो पापा जी भी आ ही गए।
उन्‍होंने हमसे पूछा कि कहां तक जाएंगे और कौन सी बर्थ है। जवाब मिलने पर तुरंत प्रस्‍ताव रख दिया कि मेरी एक बर्थ यहां है और दूसरी 23 है साइड लोअर बर्थ है आप एक्‍सचेंज कर लीजिए। मैं समझ रहा था, लेकिन यह भी पता था कि इसका मतलब है पूरी रात बैठकर गुजारना। सो मैंने मना कर दिया। पर एक अजीब से अपराधबोध से भर गया। पर इसे ज्‍यादा देर नहीं सहना पड़ा। कोई दो साहबान आए जिनकी दो में से एक बर्थ 24 थी और एक 44 यहां। उन्‍होंने सहर्ष उनका प्रस्‍ताव मान लिया,क्‍योंकि वे दोनों भी बैठकर बतियाना चाहते थे, और वह साइड लोअर बर्थ पर ही आराम से हो सकता था।
पापा जी बच्‍ची के साथ खेलने में व्‍यस्‍त हो गए। बच्‍ची अब तक नाराज थी, शायद इस वजह से कि मम्‍मी इतनी देर से झूठ क्‍यों बोल रही थी। पिछले कुछ समय से मेरा ध्‍यान इस बात पर रहता है कि मम्‍मी-पापा अपनी बच्चियों से किस प्रकार का व्‍यवहार कर रहे हैं। वे उसे एक सामान्‍य बच्‍चे की तरह देख रहे हैं या फिर लड़की होने के कारण उनके व्‍यवहार में कुछ ऐसा होता है जो खटकता हो। अमूमन अब तक सफर के दौरान मुझे ऐसे जो भी दम्‍पति मिले हैं, उनमें ऐसा कुछ नजर नहीं आया। यह एक सकारात्‍मक बात है। यहां भी कुछ ऐसा हुआ, जिसने मुझे सुखद आश्‍चर्य से भर दिया। बच्‍ची खेलते हुए अचानक बर्थ से नीचे गिर गई। उसका सिर सामने की बर्थ से टकराया और वह रोने लगी। उसका रोना देर तक जारी रहा। उसके पापा उसे गोद में लेकर चुप कराने की कोशिश में लगे रहे। मुझे नींद आ रही थी, सो में जाकर अपनी बर्थ पर सो गया। लगभग घंटे भर बाद नींद खुली तो देखा, पापा जी अब भी बच्‍ची को गोद में लेकर कम्‍पार्टमेंट के गलियारे में टहल रहे हैं। और सबसे सुखद आश्‍चर्य तो सुबह हुआ, जब देखा कि पापा-बेटी एक बर्थ पर सोए हैं। यानी की रात भर बेटी को संभालने की जिम्‍मेदारी पापा की रही है। जियो पापा जी।
हर बार की तरह उज्‍जैन में उतरकर लगभग घंटे भर बाद जयपुर-भोपाल एक्‍सप्रेस पकड़नी होती है। यह घंटा भर, प्‍लेटफार्म पर ही गुजरता है। हर बार इस घंटे भर में कुछ न कुछ ऐसा घट जाता है जो याद रह जाता है।
जयपुर-भोपाल से कुछ समय पहले मुंबई-इंदौर एक्‍सप्रेस आती है। तो 30 की सुबह भी आई। रेल के डिब्‍बों पर लिखा ही था- मुंबई-इंदौर। फिर भी चार लोगों के एक परिवार के पुरुष ने कहा, यह आई है बंबई से। परिवार की एक दसेक साल की लड़की ने टोका, बंबई नहीं मुंबई से। उनके लिए यह संवाद यहीं खत्‍म हो गया था, पर मेरे लिए कुछ व्‍याख्‍या करने का मसाला दे गया था। मैं सोच रहा था कि पुरुष उस जमाने का ही है, जब बंबई बोला जाता था, और वह अब तक दिमाग से उतरा नहीं है। दूसरे जब लड़की ने टोका, तो उसे भी ज्ञान नहीं बांटा गया कि हां पहले तो बंबई ही था, मुंबई तो अब हुआ है।
थोड़ी देर बाद ही एक और घटना घटी। एक मांगने वाला अपनी हथेली पर दो सिक्‍के रखे हुए मांगता घूम रहा था। मेरे पास ही बैठे परिवार में एक छोटा बच्‍चा था। जब वह उस परिवार के सामने आया तो उस बच्‍चे ने मांगने वाले की हथेली से सिक्‍का उठा लिया। जाहिर है उसकी मम्‍मी ने बच्‍चे को डांटा गंदी बात कहकर। बच्‍चा संभवत: न तो मांगने की अवधारणा को समझता था और न ही गंदी बात की। वह फिर अपने खेल में लग गया।
जयपुर-भोपाल एक्‍सप्रेस आई तो उसमें भी एस 3 में हमारी अपर बर्थ थी। नीचे की बर्थ पर मां-बेटी थीं। उनके साथ तीनेक साल का एक बच्‍चा था। उनकी बातचीत से समझ आया कि एक बच्‍चे की मां हैं और दूसरी नानी। दोनों ही इग्‍नू की बीएड की परीक्षा देने हफ्ते भर के लिए भोपाल जा रही हैं। वे रतलाम से आ रही थीं। रतलाम में उनका अपना निजी स्‍कूल चलता है। मां जो हैं वे फोन पर उनकी अनुपस्थिति में स्‍कूल चलाने के लिए अपने बेटे का कुछ आवश्‍यक निर्देश दे रही थीं। उनकी बातचीत से ही पता चला कि महोदया अपना चश्‍मा घर पर ही भूल आईं हैं और पासबुक यानी गाइडबुक नंबर 34 से 38 भी। दोनों के बीच चर्चा के बाद आइडिया आया कि क्‍यों न पीछे आने वाली एक अन्‍य रेल के ड्रायवर के हाथों चश्‍मा, किताबें और रह गया अचार भी बुलवा लिया जाए। अपन भोपाल में उससे स्‍टेशन पर ले लेंगे। बेटी ने अपने पिता को फोन लगाया और अपना आइडिया बताया। पिता ने शायद थोड़ी नाराजगी के बाद बात मान ली और कहा कि वे ट्राई करते हैं। थोड़ी देर बाद मां को याद आया कि फोन जो पानी में गिर गया था, वह भी तो वहीं रह गया है। एक बार फिर बेटी ने फोन लगाया। (पता नहीं उनका चश्‍मा,फोन,गाइड और अचार आया या नहीं।)  
इस बीच टीटीई महोदय आ गए। यह स्‍लीपर कोच था, पर बिना आरक्षण वाली सवारियां भी थीं। हमारे कूपे में बैठी चार सवारियों से उन्‍होंने सौ रुपए वसूले। पर रसीद नहीं दी, न सवारियों ने मांगी।
भोपाल स्‍टेशन का प्‍लेटफार्म नंबर पांच इतना खुला हुआ है कि रेल के रुकते ही आटो वाले कुलियों की तरह सीधे कम्‍पार्टमेंट में ही घुस आते हैं।
एक ने पूछा, आटो।
मैंने कहा हां, साईं बोर्ड चलोगे।
बिलकुल चलेंगे।  
कितने।  
ढाई सौ दे देना।  
हमने हमेशा की तरह रटा रटाया डायलाग बोला, पागल तो नहीं हो गया।  
अरे साब वहां से खाली आना पड़ता है।  
ढाई सौ दूंगा तो टैक्‍सी मैं नहीं जाऊंगा।
अच्‍छा आप कितने देंगे।
एक सौ बीस से एक रुपया ज्‍यादा नहीं।
चलो साब एक सौ चालीस देना। पहले वाले ने पीछा छोड़ दिया था। यह दूसरा था।
नहीं एक सौ बीस।
ठीक है आइए, दो सवारी और बिठाऊंगा।
अरे भाई तीन बिठा। हमने कहा।
अंतत: उसे और कोई सवारी नहीं मिली। वह मुझ अकेले को ही लेकर आया।
एक और सफर पूरा हुआ।  

शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

मिलना दो बालाओं ऊर्फ बलाओं से




मुलाकात तो छोटी-सी ही थी पर हुई तो ऐसी कि यादगार बन गई। 30 सितंबर की रात को दिल्‍ली से निशु का फोन आया कि,
-    चार-पांच दिन की छुट्टियां हैं, कहीं कोई वर्कशाप वगैरा हो रही हो तो बताइए।
-    अरे अब ये छुट्टियां तो त्‍यौहारों की है, लोग त्‍यौहार मनाएंगे कि वर्कशाप करेंगे!
-    हां ये बात तो है। तो आप क्‍या कर रहे हैं।
-    मैं तो भोपाल जा रहा हूं।
-    अरे वाह! कब !
-    2 को व्‍हाया तुम्‍हारी दिल्‍ली होते हुए। तीन घंटे दिल्‍ली एयरपोर्ट पर रहूंगा, समय मिले और संभव हो तो आ जाओ मिलने।
-    अरे, ये तो बहुत बढि़या है। चलो एक छुट्टी को ठिकाने लगाने का इंतजाम हो गया। आती हूं और ईशा को भी पकड़ लाऊंगी।

बहरहाल तय हुआ कि दिल्‍ली के इंदिरागांधी अंतरराष्‍ट्रीय हवाई अड्डे के यात्री प्रतीक्षालय में मुलाकात होगी।

निशु से परिचय फेसबुक के जरिए ही हुआ था। हां यह अलग बात है कि वह एकलव्‍य और चकमक से बहुत अच्‍छे से परिचित है। जब चकमक से परिचय है तो हमसे होना ही ठहरा। इतना ही नहीं वह जिस निजी स्‍कूल में पढ़ाती है, उसकी एक पाठ्यपुस्‍तक में आलू मिर्ची चाय जी भी शामिल है। तो बीच-बीच में निशु से दो-तीन बार फोन पर लंबी गपशप भी हुई। फेसबुक पर भी उसके स्‍टेटस देखता रहा हूं। और ब्‍लाग भी पढ़ा है। उसकी बातें, तर्क, विचार, दुनिया को देखने का नजरिया सुन-जानकर मेरा मन हुआ कि इन मोहतरमा को केवल सुनना ही नहीं मिलना भी चाहिए। 

ईशा और निशु सहपाठी और सहकर्मी हैं। पर ईशा से बस फेसबुक का परिचय ही था, कभी बात नहीं हुई थी। हां वह कबीर की अच्‍छी मित्र हैं। निशु की तरह वह भी एकलव्‍य और चकमक से परिचित हैं। असल में दोनों मिरांडा हाउस में बीएलएड की छात्राएं रही हैं। पिछले कुछ सालों में बीएलएड की छात्राएं शैक्षिक भ्रमण पर एकलव्‍य आती रही हैं। 

बंगलौर से दिल्‍ली की उड़ान दस मिनट लेट चली थी, पर वह टाइम पर यानी पौने  चार बजे पहुंच गई। वहां उतरकर जब फोन को साइलेंट मोड से बाहर निकाला तो पहला संदेश मिला कि दिल्‍ली से भोपाल की उड़ान साढे छह की बजाय अब आठ बजे जाएगी। उड़ान के लेट होने की सूचना से आमतौर पर खुशी देने वाली नहीं होती। पर आज खुशी ही हुई कि चलो मुलाकात के लिए थोड़ा और वक्‍त मिल जाएगा। निशु को फोन लगाया तो पता चला कि वे लोग अभी एयरपोर्ट एक्‍सप्रेस-  वे यानी मेट्रो में हैं। मैं बाहर निकलकर उनकी प्रतीक्षा करने लगा।

थोड़ी ही देर में दोनों हाजिर थीं। मैंने उन्‍हें उड़ान के लेट होने की शुभ सूचना दी तो वे भी खुशी से उछल पड़ीं। तय किया गया कि अब हम यात्री प्रतीक्षालय में ही नहीं बैठे रहेंगे। अगली उड़ान में इतना वक्‍त है कि कहीं बाहर जाकर वापस आया जा सकता है। निशु ने अपनी किसी अन्‍य मित्र से बात की और जानकारी ली। तय हुआ कि द्वारका सबसे नजदीक है, वहां रेस्‍टोरेंट हैं। 

मेट्रो लेकर हम द्वारका पहुंचे। दिल्‍ली से अपरिचित। आटो वाले से,साइकिल रिक्‍शा वाले से जिससे भी बात करनी हो निशु आगे बढ़कर बेधड़क, बेझिझक बात कर रही थी। उसका यह आत्‍मविश्‍वास देखकर अच्‍छा लग रहा था। वह अपनी बातचीत में,विचारों में जैसी है वैसी ही व्‍यवहार में। ऐसा बहुत कम होता है। बनस्बित ईशा कुछ शांत और थोड़ा-सा कम बोलने वाली लगी। (अब यह मेरा भ्रम भी हो सकता है) लेकिन आत्‍मविश्‍वास उसके चेहरे से झलकता है। मैंने उसे किसी मित्र को फोन पर कहते सुना...अरे तू फिकर मतकर अपन निपट लेंगे उससे। मतलब  यह  कि मैं दिल्‍ली की दो बालाओं के साथ था। 

हमें द्वारका के सेक्‍टर 12 में जाना था। पर किसी ऑटो वाले से बात नहीं बनी। अंतत: एक साइकिल रिक्‍शा वाले की सलाह पर उसके ही रिक्‍शे ही सवार होकर हम स्‍टेशन के पास ही दिख रहे एक बाजार की ओर रवाना हुए। बाजार में दोपहर के खत्‍म होते अवकाश जैसा माहौल था और कुछ शायद गांधी जयंती (यानी ड्राय-डे)  का असर। दुकानें उनींदी सी थीं। हम लोगों ने एक सिरे से दूसरे सिरे तक एक चक्‍कर लगाया। दुकानों में या उनके सामने जो लोग अलसाए से बैठे थे, उन्‍होंने हमें ऐसे देखा, जैसे हम चिडि़याघर से भागकर आए हैं। निशु लगभग हर दुकान में जाकर यह पूछ रही थी कि यहां कोई ऐसी दुकान है, जहां बैठकर जीमा जा सके। आखिरकार  तय हुआ कि खाना पैक करवा लिया जाए और सामने दिख रहे पार्क में उसे जीमा जाए। हमारे इस विचार से दुकान वाला सहमत नहीं दिखा। उसने हमें ऐसा न करने की सलाह दी। अलबत्‍ता उसने वैकल्पिक सुझाव दिया कि उस पार्क के बाजू में दिख रहे एक उजाड़ पार्क में हम अपने भोज का आयोजन कर सकते हैं। 

खाने का आर्डर देकर हम पार्क में चले गए। दुकानदार ने कहा कि वह खाना वहीं दे देगा।
पार्क में शाम की सैर करने वाले लोग आ चुके थे। बहरहाल हम घास पर बैठकर अपनी गपशप में लग गए। घर, परिवार, पढ़ाई आदि की बातें होने लगीं। किस के घर में कौन है...क्‍या कर रहा है आदि आदि। जब ये बातें खत्‍म हो गईं तो फिर शुरू हुआ, किस्‍सों का सिलसिला। जाहिर है वे दोनों मुझसे एकलव्‍य,चकमक और मेरे आजकल के कामधाम के बारे में जानना चाहती थीं। पिछले कुछ सालों में अपन ने यह महसूस किया है कि अपन एक अच्‍छे किस्‍सागो हैं। हां यह अलग बात है कि अपने किस्‍से में इतनी पगडंडियां आती हैं कि मुख्‍य सड़क से बार-बार नीचे उतरना पड़ता है। पर अपन ने अब इसका भी ध्‍यान रखना सीख लिया है। अपन जल्‍द ही मुख्‍य किस्‍से पर लौट आते हैं। किस्‍सों के बीच हमने अपने भोज के लिए उपयुक्‍त जगह ढूंढने का अभियान भी चलाया और इस चक्‍कर में अपनी दुनिया में मशगूल एक जोड़े को डिस्‍टर्ब भी किया। खाने का मीनू तो हमने तय किया था, पर कहना भूल गए थे कि उसमें मिर्च-मसाला और तेल कम रखना। निशु और ईशा तो सी..सी करने लगीं। बहरहाल जैसे-तैसे खाया। दाल तड़का और मिक्‍स वेज आखिरकार बच ही गई। उसे हमने संभाल लिया और तय किया कि किसी जरूरतमंद को दे देंगे।

इस बीच जेट एयरवेज ने एक और शुभ सूचना भेज दी थी कि आठ बजे की फ्लाइट अब साढ़े नौ बजे जाएगी। शाम गहराने लगी थी। हमने स्‍टेशन का रुख किया। रास्‍ते में हमें बचे हुए खाने का एक सुपात्र नजर आया। जब ईशा ने उसे देने का प्रयास किया तो उसने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि आज तो जगह-जगह भंडारे में इतना खाया है कि अब पेट के भंडार में जगह नहीं है। हम वापसी की यात्रा पैदल ही कर रहे थे। अंतत: सड़क के किनारे की एक बस्‍ती में वह खाना हमने एक बच्‍चे को सौंपा। द्वारका स्‍टेशन पहुंचते-पहुंचते सात बज चुके थे।

ईशा के पिताजी का फोन आ रहा था, उन्‍हें शायद दिल्‍ली से बाहर जाना था। मेरी फ्लाइट जाने में अब भी ढाई घंटे बाकी थे। मैंने दोनों से कहा कि अब वे लौट जाएं, मैं भी एयरपोर्ट की तरफ निकलता हूं। पर वे नहीं मानीं और एयरपोर्ट तक छोड़ने साथ आईं। वे चाहती थीं कि जितना अधिक समय मेरे साथ रह सकें..उतना अच्‍छा। चाहते तो हम भी यही थे। पर सब कुछ चाहने से तो नहीं होता। जैसे ईशा ने चाहा था कि अपन एयरपोर्ट पहुंचकर एक-एक कप कॉफी पियेंगे। पर फिर यह चाहत रह ही गई...शायद अगली मुलाकात के लिए।
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अब 28 को बंगलौर वापसी भी दिल्‍ली होकर ही है...तीन घंटे का पड़ाव एयरपोर्ट पर है..वादा तो किया है निशु ने मिलने का।