शनिवार, 1 जुलाई 2017

डेढ़ दिन की दिल्‍ली में तीन मुलाकातें


दिल्‍ली जिनसे आबाद है : कहने को दिल्‍ली में दस दिन रहा, पर दस मित्रों से भी मुलाकात नहीं हो सकी। शिक्षा के सरोकार संगोष्‍ठी में भी तमाम मित्र आए थे, पर वे सब विमर्श में व्‍यस्‍त रहे और हम विमर्श की व्‍यवस्‍था करवाने में। सबको पास रहकर भी दूर रहने का अहसास बना रहा। बस एक दिनेश कर्नाटक से इसलिए थोड़ी-बहुत गपशप हो पाई, कि वे और हम एक ही होटल में ठहरे थे।
 
बहरहाल ऐसे में नवें दिन जैसे ही अपन को साँस लेने की फुरसत मिली, अपन निकल भागे। निमंत्रण मधुदीप गुप्ता जी और Vibha Rashmi जी का भी था। पर सबसे आसान और जाना-पहचाना जो रास्‍ता था, वह रमेश उपाध्‍याय जी के घर का था। वहाँ संज्ञा और अंकित के साथ-साथ सुधा जी से भी भेंट हो गई। और फोन पर Pragya Rohini की नमस्‍ते भी मिल गई।

हाल ही में मुक्तिबोध पर आई रमेश जी की अनुपम किताब ‘मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्‍वप्‍नदृष्‍टा’ उनके हस्‍ताक्षर के साथ प्राप्‍त हुई। एक कवि की कविताओं पर किसी कहानीकार द्वारा लिखी गई शायद यह एक मात्र कृति है। इस पर सोने में सुहागा हुआ संज्ञा उपाध्‍याय की शोध पुस्‍तक ‘हरिशंकर परसाई के कथासाहित्‍य में भारतीय जनतंत्र’ को पाकर।

हमेशा की तरह संज्ञा और अंकित ने तरह-तरह से आवभगत की। चाय पिलाई, बिस्‍कुट खिलाए, तरबूज खिलाया और फिर ताजा-ताजा मैंगोशेक भी पिलाया।

योजना तो भोजन करवाने की भी थी, पर हम अनुमति लेकर निकल लिए।
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पिछली दिल्‍ली यात्रा में फेसबुक पर हमारी हजारवीं दोस्‍त बनीं थीं Preety Devgan : उनसे Nishu Khandelwal के घर पर मुलाकात हुई थी। शायद इस बार वे हमसे मिलना नहीं चाहती थीं, इसलिए अपने टखने में चोट लगाकर बैठी थीं। इतना ही नहीं, हम फोन पर सम्‍पर्क न कर पाएँ इसलिए अपना फोन भी पानी में गिरा दिया था। पर हम भी कहाँ मानने वाले थे। रमेश जी के घर से निकले तो हाल-चाल पूछने प्रीति के घर ही जा पहुँचे। 😜

दिल्‍ली के शास्‍त्रीनगर की एक गली में प्रीति और उनका परिवार रहता है। जब मैं प्रीति के घर पहुँचा तो उनकी माँ ने मेरा स्‍वागत किया। फिर मुझे एक छोटे से कमरे में ले जाया गया। वहाँ डबलबेड पर एक नौजवान अधलेटा था। वह पैरों पर कंबल डाले, टीवी देख रहा था। दिल्‍ली की जानलेवा गरमी में कंबल। दरअसल कमरे में एसी चल रहा था। नौजवान ने मुझे देखकर टीवी की आवाज को म्‍यूट कर दिया। वहीं एक कुर्सी पर मैं बैठ गया। प्रीति और उनकी माँ भी पास पड़े सोफे पर बैठ गईं। प्रीति ने नौजवान से परिचय करवाया। वह प्रीति वही छोटा भाई था, जिसका बचपन से बस एक ही सपना रहा है कि वह ड्रायवर बने। और वह बन भी गया है। नाम उसका साहिल है। 

मैं सोच रहा था, अजीब आदमी है। हम हैं कि इनके घर आए हैं और ये जनाब अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रहे। कायदे से तो इन्‍हें हमें देखते ही पलंग से उतरकर खड़े हो जाना चाहिए था। हमने सोचा चलो, अब
आजकल के नौजवान हैं, थोड़ा तो कुछ अलग होंगे ही। हमें क्‍या । हम भी उनकी बहन के मित्र हैं, उनके तो नहीं न। लगभग 10 मिनट ये ख्‍याल मेरे मन में चलते रहे। प्रीति और हम बातचीत करते रहे, ये जनाब म्‍यूट टीवी देखते रहे। कुछ समय बाद अचानक ही मैं अपने आप में गहरी शर्मिन्‍दगी में डूब गया। बातों-बातों में पता चला कि एक कार दुर्घटना में साहिल के एक पैर में फैक्‍चर हो गया है और उस पर प्‍लास्‍टर चढ़ा हुआ है। तो कंबल की नीचे प्‍लास्‍टर वाला पैर है। साहिल ने कंबल हटाकर दिखाया। मैंने अपने आपको थोड़ा कोसा और फिर मन ही मन साहिल से क्षमा मांग ली।

प्रीति की माँ नीलम जी घर के निचले तल्‍ले में बच्‍चों की एक आँगनवाड़ी चलाती हैं। पिता पंजाब में डॉक्‍टर हैं। वे हर हफ्ते आते हैं।

बातचीत का कोटा खत्‍म हुआ तो नीलम जी ने बैंगन का भरता मटर वाला और बूँदी का गाढ़ा रायता हमारे सामने
परोसा। साथ में पुदीने की चटनी थी। गैस के चूल्‍हे से उतरती गरम रोटियों पर घी लगा हुआ था। हमारे मना करने के बावजूद वे पाँचवीं रोटी यह कहकर थाली में रख गईं, कि ‘यह रोटी बहुत बढि़या फूली है और इसका मतलब है कि खाने वाले को बहुत भूख लगी है।‘ बात तो उनकी सच ही थी, दरअसल हमने दोपहर का भोजन किया ही नहीं था। और फिर ऐसा स्‍वादिष्‍ट खाना मिले तो कहना ही क्‍या। खाने के बाद एक गिलास जूस भी मिला था, पर हम भूल गए कि वह किस चीज का था।

पर हाँ, फेसबुक की हजारवीं दोस्‍त के परिवार से यह मुलाकात कतई भूलने वाली नहीं है।

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एयरपोर्ट दोस्‍त : फेसबुक पर कोई Nishu Khandelwal और हमारी मुलाकातों के सारे किस्‍से एक साथ मिलाकर पढ़े तो शायद यही नाम देगा।

असल में इस लड़की से जितनी मुलाकातें हुई हैं,उनमें एयरपोर्ट का अहम रोल है। पहली मुलाकात भी हमारी दिल्‍ली एयरपोर्ट पर हुई थी। साथ में Isha Bhatt भी थीं। बेंगलूरु से भोपाल जाते हुए दिल्‍ली में लम्‍बा विश्राम था। तो निशु और ईशा ने उस समय का फायदा उठाया। हम लोगों ने लगभग चार घण्‍टे साथ गुजारे थे। फिर दो और मुलाकातें हुईं। एक बार निशु के घर भी जाना हुआ। उनकी मम्‍मी-पापा और छोटे भाई-बहन से भी मिलना हुआ।
फिर पुस्‍तक मेले में मिली दोस्‍तों के साथ। इसी बरस फरवरी में एक बार फिर बाड़मेर से लौटते हुए हवाई जहाज पकड़ने के लिए दिल्‍ली आना हुआ तो विश्राम के लिए निशु का घर ही ठिकाना बना। अब कुछ ऐसा हो गया है कि दिल्‍ली यात्रा तब तक पूरी ही नहीं होती है, जब तक निशु से मुलाकात न हो जाए।

तो इस बार भी दिल्‍ली से वापसी वाले दिन निशु एयरपोर्ट पर मिलने चली आई। ज्‍यादा नहीं,पर हम दो घण्‍टे साथ रहे, साथ खाना खाया और बतियाए।

हर बार जब मुलाकात होती है, तो हम अपने अनुभव की छोटी-मोटी गुल्‍लक के कुछ कीड़े उसके दिमाग में डाल देते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। यह जो लड़की है, पिछले चार-पाँच साल से स्‍कूल में पढ़ा रही है। स्‍कूल भी तीन बदल चुकी है। पर पढ़ाने के साथ-साथ आजकल बतौर स्रोत व्‍यक्ति विभिन्‍न शैक्षिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भागीदारी भी कर रही है। उसके साथ, कुछ और भी साथी हैं। जब मैं यह लिख रहा हूँ, तब भी वह एक ऐसे ही प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्‍सा है। वह प्रशिक्षण कार्यक्रमों के अपने अनुभवों का दस्‍तावेजीकरण भी कर रही है। मैंने इस बार उसे सलाह दी है कि अपने अनुभवों को इस नजरिए से भी दर्ज करे कि कभी उन्‍हें एक पुस्‍तक के रूप में प्रकाशित किया जा सके।
हमारा आइडिया उसे पसंद आया, और एयरपोर्ट पर विदा करते हुए बोली, ‘वाह क्‍या आइडिया है सर जी।’
                                                                                                                           0 राजेश उत्‍साही 

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